“Why have you become a guru, what practice do you claim?The affliction of mastership has clung to your name.”
तुम गुरु होकर क्यों बैठे हो, किस साधना का दावा करते हो? तुम्हें स्वामित्व का रोग लग गया है।
यह दोहा सवाल करता है कि कोई व्यक्ति गुरु बनकर क्यों बैठ गया है, जब वह अभी भी स्वामी होने के 'रोग' से ग्रस्त है। इसका अर्थ है कि एक सच्चा आध्यात्मिक मार्गदर्शक अहंकार और सत्ता की इच्छा से मुक्त होना चाहिए। जब कोई गुरु का पद धारण करता है, तो उसे विनम्रता और सेवा के मार्ग पर चलना चाहिए। यह हमें याद दिलाता है कि असली आध्यात्मिक नेतृत्व निस्वार्थता से आता है, न कि अधिकार या पहचान की चाहत से। हमें गुरु पद के साथ आने वाले अहंकार और सत्ता के प्रलोभनों से सावधान रहना चाहिए।
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