“Says Akho, I babbled in a dream,As things are, I could not truly deem.”
अखो कहते हैं कि मैं सपने में बड़बड़ाया, और मैं चीजों को वैसा नहीं देख पाया जैसी वे वास्तव में हैं।
संत कवि अखा कहते हैं कि हम अक्सर एक सपने जैसी अवस्था में जीते हैं। वे कहते हैं, "मैं सपने में बड़बड़ाया, जैसा है वैसा देख न सका।" यह दोहा हमें याद दिलाता है कि जैसे हम नींद में बिना समझे बातें करते हैं, वैसे ही हम अक्सर जीवन में चीजों की वास्तविक प्रकृति को समझे बिना ही चलते रहते हैं। हम भ्रमों में उलझे रहते हैं, सत्य को स्पष्ट रूप से देख नहीं पाते। यह हमें जागने, सतही दिखावों से परे देखने और वास्तविकता को वैसे ही देखने के लिए एक कोमल प्रेरणा है, बजाय इसके कि हम अपनी कहानियों या दुनिया के मायावी प्रदर्शन में खो जाएँ।
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