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ग़ज़ल

Akha Bhagat 24

اکھا بھگت 24
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

यह ग़ज़ल अखा भगत द्वारा माया के भ्रम और उससे उत्पन्न आत्मिक अलगाव का वर्णन करती है, जहाँ शुद्धता कीचड़ में खो जाती है। कवि बताता है कि माया के कारण सच्चा ज्ञान अदृश्य हो जाता है, और ब्रह्मवेत्ता ही इन बंधनों से परे है। यह ग़ज़ल आध्यात्मिक ज्ञान की सर्वोच्चता पर ज़ोर देती है।

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1
નીર હતું તે કીચમાં ગયું આત્મથકી તે અળગું રહ્યું;
पानी कीचड़ में मिल गया, फिर भी वह अपने मूल स्वरूप से अलग बना रहा।
2
છે તો ઘણો નવ દીસે ચંદ કહે અખો માયાનો ફં દ.
यह बहुत है तो भी चाँद दिखाई नहीं देता। अखो कहते हैं, 'यह माया का फंदा है।'
3
અનંત કળામાં અદકા ખરા બ્રહ્મવેત્તા એ સૌથી પરા;
अनंत कलाओं में सचमुच अद्वितीय, ब्रह्मवेत्ता उन सभी में सर्वोच्च हैं।
4
વેદ બ્રહ્માએ પૂજ્યા હરિ તેથી લક્ષ તજજ્ઞનો દુ રી;
वेद ब्रह्मा ने हरि की पूजा की; इस कारण लाखों विद्वान दूर रहे।
5
ભૂતભવિષ્ય ને અજપાજપ અખો નહિ તો શેનો થાપ.
यह दोहा पूछता है कि भूत, भविष्य और अजपाजप (बिना उच्चारण के स्मरण) का क्या आधार है यदि 'अखो' (संत-कवि अखो या सत्य की अवधारणा) मौजूद नहीं है। यह सुझाता है कि इस मूल समझ के बिना, सब कुछ निराधार है।
6
વષ્ણવ ભેખ ધારીને ફરે પરસાદ ટાણે પત્રાવળાં ભરે;
वह वैष्णव का भेष धारण करके घूमता है और प्रसाद के समय पत्तलें भरता है।
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