“Advaita performs the deeds of Dvaita, Assuming the names Sagun and Nirgun.”
अद्वैत द्वैत के काम करता है, सगुण और निर्गुण नाम धारण करता है।
यह दोहा बहुत खूबसूरती से बताता है कि भले ही हमारी परम वास्तविकता 'अद्वैत' है, यानी सब कुछ एक ही है, फिर भी वह 'द्वैत' की दुनिया में काम करती है, जहाँ विविधता और अलग-अलग चीज़ें दिखती हैं। इसे ऐसे समझें जैसे एक ही समुद्र से कई लहरें बनती हैं। इसी तरह, जो परम सत्य 'निर्गुण' है, यानी जिसमें कोई खास गुण नहीं हैं, वही 'सगुण' रूप ले लेता है, यानी गुणों और नामों के साथ प्रकट होता है जिन्हें हम देख और समझ सकते हैं। तो, 'सगुण' और 'निर्गुण' बस एक ही सत्य को समझने या नाम देने के अलग-अलग तरीके हैं। अंततः, यह यही दर्शाता है कि वह एक ही परम सार हमारे आस-पास दिखने वाले अनेक रूपों के माध्यम से ही प्रकट होता है और कार्य करता है।
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