“My ears have burst from countless stories told,Akhā, still divine wisdom hasn't unfolded.”
कथाएँ सुन-सुनकर मेरे कान फट गए हैं, हे अखा, फिर भी मुझे ब्रह्मज्ञान प्राप्त नहीं हुआ।
यह दोहा संत कवि अखा की गहरी बात बताता है। वे कहते हैं, "कथाएँ सुनते-सुनते मेरे कान थक गए हैं।" इतनी कथाएँ सुनने के बाद भी, अखा दुख के साथ कहते हैं, "मुझे अभी भी सच्चा ब्रह्मज्ञान, यानी आत्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ।" इस दोहे के माध्यम से अखा हमें समझाते हैं कि सिर्फ जानकारी इकट्ठा करने या उपदेश सुनने से ज्ञान नहीं मिलता। हम भले ही ढेर सारी किताबें पढ़ लें या अनगिनत प्रवचन सुन लें, लेकिन जब तक हम उन्हें अपने जीवन में नहीं उतारते और उनका सार नहीं समझते, तब तक वह सब अधूरा है। सच्चा ज्ञान भीतर से आता है, वह अनुभव और आत्म-बोध का परिणाम होता है, न कि केवल बाहरी बातों को सुनने का।
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