“Of bondage, of freedom, he does not speak,Nor sky-borne flowers, a garland make.”
वह बंधन या मोक्ष का उच्चारण नहीं करता। आकाश के फूल हार नहीं बनते।
यह दोहा हमें समझाता है कि 'बंधन' और 'मोक्ष' जैसी अवधारणाएँ स्वयं कोई घोषणा नहीं करतीं। ये हमारी अपनी धारणाएँ हैं। जिस तरह विशाल और असीमित आकाश को अपनी भव्यता दर्शाने के लिए फूलों की माला की आवश्यकता नहीं होती, उसी तरह सच्ची मुक्ति इन द्वैतवादी विचारों से परे है। आकाश स्वयं में पूर्ण है, उसे किसी बाहरी सजावट की ज़रूरत नहीं। इसी प्रकार, परम मुक्ति कुछ पाने या किसी चीज़ से छूटने के बारे में नहीं है, बल्कि यह उस अवस्था से भी ऊपर है जहाँ हम बँधे होने या मुक्त होने के विचार रखते हैं। यह एक ऐसी अनुभूति की ओर इशारा करता है जहाँ ये अवधारणाएँ मिट जाती हैं, और हम अपने स्वाभाविक, बिना शर्त वाले अस्तित्व को पहचानते हैं, ठीक आकाश की तरह, जो स्वयं में पूर्ण है।
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