जो हमें आदिकाल से उलझाता रहा,
वही मौन लाया हूँ मैं वाणी के स्वांग में!
“What has been perplexing us since ancient times, That very silence I have brought in the guise of speech!”
— अमृत घायल
अर्थ
कवि कहता है कि जो बात हमें आदिकाल से उलझा रही थी या समझ नहीं आ रही थी, उसी गूढ़ मौन को मैं अब शब्दों के रूप में व्यक्त कर रहा हूँ।
विस्तार
यह शेर शब्दों और मौन के बीच के गहरे विरोधाभास को दर्शाता है। शायर कह रहे हैं कि जो चीज़ हमें हमेशा से उलझाती आई है, वो है मौन। वो कहते हैं कि भले ही मैं बोल रहा हूँ, लेकिन मेरी बात में जो सार है, वो भी वही शाश्वत मौन है। यह एक बहुत ही गहरा अहसास है कि कभी-कभी खामोशी, हज़ारों शब्दों से ज़्यादा बोलती है।
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