न आँखों में शर्म की एक बूंद भी है,यह ज़माना भी बहुत बेशर्म हो गया है!
“Not even a speck of shame in the eyes,The age itself has become very shameless!”
— अमृत घायल
अर्थ
आँखों में शर्म का एक कतरा भी नहीं है, यह ज़माना भी बहुत बेशर्म हो गया है।
विस्तार
यह शेर एक ऐसे समाज का चित्रण करता है जहाँ शर्म और लज्जा पूरी तरह से समाप्त हो गई है। शायर कहते हैं कि अब लोगों की आँखों में थोड़ी सी भी शर्म बाकी नहीं बची है, जो आत्मा का आईना मानी जाती हैं। यह टिप्पणी इस दुखद अवलोकन की ओर ले जाती है कि पूरा ज़माना ही बेशर्म हो गया है। यह कविता नैतिक मूल्यों में गिरावट और विनम्रता जैसे पारंपरिक गुणों के खो जाने पर एक मार्मिक टिप्पणी है। यह पंक्तियाँ इस बात पर गहरी निराशा और दुख व्यक्त करती हैं कि कैसे समाज ने अपनी मर्यादा त्याग दी है और एक निर्लज्ज रवैया अपना लिया है।
Comments
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
