ग़ज़ल

याँ ख़ाक का बिस्तर है गले में कफ़नी है

یاں خاک کا بستر ہے گلے میں کفنی ہے
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 6 shers· radif: है

यह ग़ज़ल प्रेमी की बेबसी, विरह की निरंतर वेदना और महबूब की बेपरवाह सुंदरता के बीच के गहरे अंतर को रेखांकित करती है। इसमें इश्क़ के हाथों उजड़े हुए आशिक़ की तड़प, फ़रियाद और जीवन-मृत्यु के कगार पर खड़े होने की मार्मिक व्यथा व्यक्त हुई है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
याँ ख़ाक का बिस्तर है गले में कफ़नी है वाँ हाथ में आईना है गुल पैरहनी है
यहाँ मिट्टी का बिछौना है और गले में कफ़न है, जबकि वहाँ हाथ में आईना है और फूलों का लिबास पहना हुआ है।
2
हाथों से हमें इश्क़ के दिन रात नहीं चैन फ़रियाद ओ फ़ुग़ाँ दिन को है शब नारा-ज़नी है
इश्क़ के हाथों हमें दिन-रात चैन नहीं है; दिन में रोना और फ़रियाद करना पड़ता है और रात में चीख़-पुकार मचती है।
3
हुश्यार हो ग़फ़लत से तू ग़ाफ़िल न हो ऐ दिल अपनी तो नज़र में ये जगह बे-वतनी है
ऐ दिल, तू लापरवाही छोड़कर सतर्क हो जा और बेपरवाह मत रह, क्योंकि मेरी नज़र में यह जगह (दुनिया) तो केवल परदेस यानी वतन से दूरी है।
4
कुछ कह नहीं सकता हूँ ज़बाँ से कि ज़रा देख क्या जाए है जिस जाए न कुछ दम-ज़दनी है
मैं ज़बान से कुछ कह नहीं सकता, बस ज़रा देखो कि यह कैसी जगह है जहाँ साँस लेने या कुछ बोलने की भी गुंजाइश नहीं है।
5
मिज़्गाँ पे मिरे लख़्त-ए-जिगर ही नहीं यारो इस तार से वो रिश्ता अक़ीक़-ए-यमनी है
हे दोस्तो, मेरी पलकों पर सिर्फ़ मेरे जिगर के टुकड़े ही नहीं आँसुओं के रूप में मौजूद हैं, बल्कि पलक रूपी इस धागे में पिरोए जाकर वे यमनी अक़ीक़ की लड़ी बन गए हैं।
6
लिख और ग़ज़ल क़ाफ़िए को फेर 'ज़फ़र' तू अब तब्अ' की दरिया की तिरी मौज-ज़नी है
ऐ ज़फ़र, तू क़ाफ़िया बदलकर एक और ग़ज़ल लिख, क्योंकि इस वक़्त तेरी तबियत के दरिया में मौजें उठ रही हैं।
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