बाँधी ज़ाहिद ने तवक्कुल पर कमर सौ बार चुस्त लेकिन आख़िर बाइस-ए-सुस्ती-ए-हिम्मत खुल गई

“A hundred times the ascetic firmly girt his loins in trust divine; yet at last, the cause of his flagging resolve unraveled and stood revealed.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

ज़ाहिद ने ईश्वर पर भरोसे के लिए सौ बार मज़बूती से कमर बाँधी, लेकिन आख़िरकार कमज़ोर हिम्मत के कारण उसका इरादा टूट गया।

विस्तार

यहाँ शायर ज़ाहिद (तपस्वी) के दावों पर हल्की-फुल्की और चुटीली बात कह रहा है। ज़ाहिद ने ईश्वर पर पूरे भरोसे (तवक्कुल) का दिखावा करते हुए सौ बार अपनी कमर कसकर बाँधी, मगर हर बार उसकी हिम्मत डगमगा गई। 'कमर खुल गई' में बहुत खूबसूरत दोहरा अर्थ है—एक तरफ तो हौसला पस्त होने से उसकी बाँधी हुई पेटी ढीली पड़ गई, और दूसरी तरफ उसकी कमज़ोर नीयत का राज़ सबके सामने खुल गया।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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