“I am not a marriage, nor am I a joy-bringing thing, I am not a pure, beautiful, lovely thing. I am neither water nor am I earth, I am neither fire nor am I wind.”
मैं न शादी हूँ न गमनाकी, मैं न मैं पलेटी पाकी। मैं न आबी न मैं खाकी, मैं न आतिश न मैं पाउन।
Bulleh Shah यहाँ एक गहरे विरक्ति के भाव को प्रस्तुत करते हैं, जो भौतिक सीमाओं से परे है। वह कहते हैं कि वह न विवाह हैं और न ही ग़मनाकी, न ही वह पवित्र हैं और न ही अपवित्र। जल और अग्नि जैसे मूलभूत द्वंद्वों को सूचीबद्ध करके, शायर यह स्थापित करते हैं कि उनका अस्तित्व सभी सामान्य लेबल से परे है। यह केवल कविता नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक बोध है जो हमें विपरीत ध्रुवों के बीच की अनंत जगह में अपनी पहचान खोजने के लिए प्रेरित करता है।
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