Sukhan AI
आह ये मजमा-ए-अहबाब, ये बज्म-ए-खामोश
आज महफिल में फिराक सुखन-आरा भी नहीं

Oh, this gathering of beloved ones, this silent assembly, Today, even the eloquent poetry of separation is absent from the gathering.

फ़िराक़ गोरखपुरी
अर्थ

अरे, ये महबूबों का जमावड़ा, ये खामोश महफ़िल; आज महफ़िल में बिछड़ने का कोई कलाम भी नहीं है।

विस्तार

दोस्तों, यह शेर बहुत गहरी उदासी को बयान करता है। शायर कह रहे हैं कि ये महफ़िल, ये जमावड़ा.... ये सब खामोशी में डूबा हुआ है। उन्होंने कहा कि आज तो उनके पास अपनी शायरी का जादू, अपनी बातें करने का हुनर भी नहीं है। यह सिर्फ़ खामोशी नहीं है, यह एक ऐसा खालीपन है जो दिल और ज़ुबान दोनों को चुप करा देता है। यह अपनी कमज़ोरी को स्वीकार करना है!

ऑडियो

पाठ
हिंदी अर्थIn app
अंग्रेज़ी अर्थIn app
हिंदी विस्तारIn app
अंग्रेज़ी विस्तारIn app
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.