क्या कहूँ तारीकी-ए-ज़िन्दान-ए-ग़म अंधेर है
पुम्बा नूर-व-सुब्ह से कम जिस के रौज़न में नहीं
“What can I say of sorrow's dungeon, its darkness so profound?Where in its window, cotton outshines both light and dawn all around.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
ग़म के कारागार की तारीकी क्या कहूँ, घोर अंधेर है। जिसके झरोखे में रखा रुई का टुकड़ा भी रोशनी और सुबह से कम नहीं लगता।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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