“Laila's tent is dark, Majnun's home a ruin stark,Such fervent desolation, from love's visible mark.”
लैला का खेमा काला है और मजनूँ का घर बर्बाद है। वीरानी का यह जोश बाहर से दिए गए इश्क़ के दाग़ से है।
ख़ेमा-ए-लैला सियाह ओ ख़ाना-ए-मजनूँ ख़राब, जोश-ए-वीरानी है इश्क़-ए-दाग़-ए-बैरूं-दादा से। लैला का तंबू काला पड़ गया है और मजनूँ का घर बर्बाद हो चुका है। यह जो चारों तरफ़ सन्नाटा और वीरानी दिख रही है, यह उस प्यार के ज़ख्म की वजह से है जो अब बाहर ज़ाहिर हो गया है। यहाँ 'ख़ेमा' का मतलब तंबू है और 'सियाह' का मतलब काला। 'वीरानी' का अर्थ है सूनापन, और 'बैरूं-दादा' उस दाग़ या ज़ख्म को कहते हैं जो अंदर से निकलकर बाहर दिखाई देने लगे। मेरे दोस्त, ग़ालिब यहाँ उस मोड़ की बात कर रहे हैं जब इंसान का दुख इतना गहरा हो जाता है कि वह उसके आस-पास की चीज़ों को भी बदरंग कर देता है। आपने महसूस किया होगा कि जब मन उदास होता है, तो घर की दीवारें भी काटने को दौड़ती हैं। ग़ालिब लैला और मजनूँ की मिसाल देते हुए कह रहे हैं कि उनके घर और तंबू इसलिए बर्बाद हुए क्योंकि उनका आंतरिक दुख अब बाहर छलक आया है। यह वैसा ही है जैसे कोई गहरी चोट जो पहले अंदर ही अंदर थी, अब अपना निशान कपड़ों पर छोड़ने लगी हो। वह कह रहे हैं कि जब इश्क़ का जुनून अपनी हद पार करता है, तो वह केवल दिल को नहीं तोड़ता, बल्कि वह इंसान की पूरी दुनिया को एक वीराने में बदल देता है। यह वीरानी बाहर से नहीं आई, बल्कि दिल के अंदर की बेचैनी का नतीजा है। जैसे कोई पुराना पेड़ जो अंदर से सूख चुका हो, उसकी गिरती हुई सूखी पत्तियाँ और ठूँठ इस बात का सबूत होते हैं कि उसकी जड़ों में अब पानी नहीं बचा। जब रूह वीरान होती है, तो चमकता हुआ शहर भी एक उजड़े हुए घर जैसा नज़र आता है।
