“With love for the rose, false is the claim of detachment's art,The cypress, though free, is captive to the garden's heart.”
फूल के प्रेम से वैराग्य का दावा ग़लत है। सरू का पेड़ अपनी आज़ादी के बावजूद बग़ीचे का क़ैदी है।
पास आ जाओ मेरे दोस्त। चाय गरम है और चिराग की रोशनी इतनी तो है कि हम एक दूसरे को देख सकें। आज हम दिल के एक राज़ पर बात करेंगे। उल्फ़त-ए-गुल से ग़लत है दावा-ए-वारस्तगी। सर्व है बा-वस्फ़-ए-आज़ादी गिरफ़्तार-ए-चमन। अगर तुम्हें फूल से मोहब्बत है, तो तुम्हारा आज़ाद होने का दावा झूठा है। उस सर्व के पेड़ को देखो जिसे सब आज़ाद कहते हैं, वो भी तो बाग का कैदी है। यहाँ उल्फ़त का मतलब है प्यार, वारस्तगी का अर्थ है आज़ादी या बेपरवाही, और सर्व उस ऊँचे सीधे पेड़ को कहते हैं जो अपनी ऊंचाई के लिए मशहूर है। ग़ालिब यहाँ हमारे पास बैठे दुनिया को देख रहे हैं। वो हमें सिखा रहे हैं कि हम अक्सर अपनी आज़ादी की बातें करते हैं, पर जैसे ही हम किसी चीज़ से लगाव रखते हैं, वो आज़ादी खत्म हो जाती है। देखो, प्यार और आज़ादी दो अलग रास्ते हैं। अगर तुम गुलाब से प्यार करते हो, तो तुम उसके कांटों और उसके मौसमों से बँध जाते हो। तुम फिर ये नहीं कह सकते कि तुम बेपरवाह हो। वो सर्व के पेड़ की मिसाल देते हैं। शायरी में इस पेड़ को आज़ाद माना जाता है क्योंकि इस पर किसी फल का बोझ नहीं होता। पर ये पेड़ भी तो अपनी जड़ों से बँधा है, वो अपने बाग को छोड़ कर कहीं नहीं जा सकता। इसे ऐसे समझो जैसे कोई पक्षी आसमान से प्यार करे पर फिर भी उसी डाल पर लौट आए। तुम्हें लग सकता है कि तुम उड़ने के लिए आज़ाद हो, पर तुम्हारे दिल ने पहले ही अपनी कैद चुन ली है। एक पुरानी बात है कि प्यार करना अपनी किस्मत को किसी और के हाथ में दे देना है। जब हमें लगता है कि हमारे पास कोई ज़ंजीर नहीं है, तब भी हमारी भावनाएं ही हमारी सबसे बड़ी ज़ंजीर होती हैं। जो प्यार में है वो कभी आज़ाद नहीं हो सकता, और शायद यही इस दुनिया का सबसे खूबसूरत जाल है।
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