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बेचारा कितनी दूर से आया है शैख़ जी
का'बे में क्यों दबाएँ न हम बरहमन के पाँव

This poor soul has journeyed from afar, good Shaykh; why should we not tend the Brahmin's feet, even in the Ka'aba?

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

यह बेचारा कितनी दूर से आया है, हे शैख़ जी; हम का'बे में ब्राह्मण के पाँव क्यों न दबाएँ?

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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