Sukhan AI
ग़ज़ल

दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं

دیوانگی سے دوش پہ زنّار بھی نہیں
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 10 shers· radif: नहीं

यह ग़ज़ल एक प्रेमी की गहरी दरिद्रता और थकावट को दर्शाती है। शायर अपनी इस हालत पर अफ़सोस करता है कि उसके पास एक मामूली धागा भी नहीं है, और महबूब के दीदार की तीव्र इच्छा के बावजूद उसमें देखने की ताक़त नहीं बची। अंततः, बिना इश्क़ के जीवन असंभव है, फिर भी शायर में इश्क़ के मीठे दर्द को सहने की भी क्षमता नहीं बची है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं या'नी हमारे जेब में इक तार भी नहीं
मेरी दीवानगी के कारण, मेरे कंधे पर अब ज़ुन्नार (पवित्र धागा) भी नहीं है। इसका मतलब है कि मेरी जेब में एक तार भी नहीं है।
2
दिल को नियाज़-ए-हसरत-ए-दीदार कर चुके देखा तो हम में ताक़त-ए-दीदार भी नहीं
हमने अपने दिल को देखने की हसरत पर क़ुर्बान कर दिया था। लेकिन जब देखा, तो हममें देखने की ताक़त ही नहीं बची थी।
3
मिलना तिरा अगर नहीं आसाँ तो सहल है दुश्वार तो यही है कि दुश्वार भी नहीं
यदि तुमसे मिलना आसान नहीं है, तो यह स्वीकार करना सरल है। असल मुश्किल तो यह है कि यह मुश्किल भी नहीं है।
4
बे-इश्क़ उम्र कट नहीं सकती है और याँ ताक़त ब-क़दर-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार भी नहीं
बिना प्रेम के जीवन व्यतीत नहीं हो सकता, और यहाँ (मुझमें) दर्द की उस لذत जितनी भी ताक़त नहीं है।
5
शोरीदगी के हाथ से है सर वबाल-ए-दोश सहरा में ऐ ख़ुदा कोई दीवार भी नहीं
शोरीदगी के कारण मेरा सिर कंधे पर बोझ बना हुआ है। हे ख़ुदा, इस रेगिस्तान में कोई दीवार भी नहीं है।
6
गुंजाइश-ए-अदावत-ए-अग़्यार यक तरफ़ याँ दिल में ज़ोफ़ से हवस-ए-यार भी नहीं
एक तरफ तो दुश्मनों की दुश्मनी की कोई गुंजाइश नहीं है, और यहाँ दिल में इतनी कमजोरी है कि महबूब की चाहत भी नहीं बची।
7
डर नाला-हा-ए-ज़ार से मेरे ख़ुदा को मान आख़िर नवा-ए-मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार भी नहीं
मेरे कड़वे विलापों से डरो और ईश्वर को मानो। आख़िरकार, यह केवल एक क़ैदी पक्षी की आवाज़ भी नहीं है।
8
दिल में है यार की सफ़-ए-मिज़्गाँ से रू-कशी हालाँकि ताक़त-ए-ख़लिश-ए-ख़ार भी नहीं
मेरे दिल में प्रियतम की पलकों की पंक्ति से मुकाबला करने की इच्छा है, हालाँकि उसमें एक काँटे की चुभन सहने की भी शक्ति नहीं है।
9
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
ऐ ख़ुदा, इस सादगी पर कौन न मर जाए? वे लड़ते हैं और उनके हाथ में तलवार भी नहीं है।
10
देखा 'असद' को ख़ल्वत-ओ-जल्वत में बार-हा दीवाना गर नहीं है तो हुश्यार भी नहीं
मैंने 'असद' को कई बार अकेले में और लोगों के बीच देखा है। अगर वह दीवाना नहीं है तो समझदार भी नहीं है।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.

दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं | Sukhan AI