ग़ज़ल
हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी
حاصل سے ہاتھ دھو بیٹھ اے آرزوخرامی
यह ग़ज़ल अधूरी इच्छाओं के दर्द और आकांक्षा की निरर्थकता को दर्शाती है, जो अपने हासिल को छोड़ने का आग्रह करती है। शायर स्वयं को बुझे हुए चिराग़ के समान बताते हुए, अपूर्णता और गहन दुख की भावना व्यक्त करता है। यह पीड़ा, बेवफ़ाई और सौंदर्य व नियति की अंतर्निहित, अक्सर विनाशकारी शक्ति के विषयों की पड़ताल करती है।
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1
हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी
दिल जोश-ए-गिर्या में है डूबी हुई असामी
हे इच्छाओं के पीछे भटकने वाले, अपनी सभी प्राप्तियों से हाथ धो बैठो। हृदय आँसुओं के उफान में डूबी हुई एक दस्तावेज़ की तरह है।
2
उस शम्अ' की तरह से जिस को कोई बुझा दे
मैं भी जले-हुओं में हूँ दाग़-ए-ना-तमामी
उस शम्अ' की तरह जिसे किसी ने बुझा दिया हो, मैं भी जले हुए लोगों में हूँ, अधूरेपन का एक दाग़ बनकर।
3
करते हो शिकवा किस का तुम और बेवफ़ाई
सर पीटते हैं अपना हम और नेक-नामी
तुम किसकी बेवफ़ाई का शिकवा करते हो, जबकि तुम खुद बेवफ़ा हो। हम और हमारी नेकनामी तो अपना सर पीट रहे हैं।
4
सद-रंग-ए-गुल कतरना दर-पर्दा क़त्ल करना
तेग़-ए-अदा नहीं है पाबंद-ए-बे-नियामी
बहुरंगी फूल को तोड़ना उसे परदे के पीछे से मारना है। अदा की तलवार को वार करने के लिए म्यान से बाहर निकलने की ज़रूरत नहीं होती है।
5
तर्फ़-ए-सुख़न नहीं है मुझ से ख़ुदा-न-कर्दा
है नामा-बर को उस से दावा-ए-हम-कलामी
ख़ुदा न करे, ऐसा नहीं है कि मैं बात करने से कतराता हूँ या मेरी आवाज़ नहीं है। बल्कि, संदेशवाहक दावा कर रहा है कि उसने उससे सीधे बात की है।
6
ताक़त फ़साना-ए-बाद अंदेशा शोला-ईजाद
ऐ ग़म हुनूज़ आतिश ऐ दिल हुनूज़ ख़ामी
मेरी ताक़त हवा में एक कहानी की तरह है; मेरे विचार हमेशा आग पैदा करने वाले हैं। हे ग़म, तुम अब भी आग हो; और हे दिल, तुम अब भी कच्चे हो।
7
हर चंद उम्र गुज़री आज़ुर्दगी में लेकिन
है शरह-ए-शौक़ को भी जूँ शिकवा ना-तमामी
हालाँकि मेरी उम्र दुख में गुज़री, फिर भी मेरे शौक़ का बयान, एक शिकायत की तरह, अधूरा ही रहा।
8
है यास में 'असद' को साक़ी से भी फ़राग़त
दरिया से ख़ुश्क गुज़रे मस्तों की तिश्ना-कामी
निराशा में 'असद' को साक़ी से भी कोई परवाह नहीं। मतवालों की प्यास नदी के पास से भी सूखी ही गुज़र गई, जैसे नदी में पानी ही न हो।
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