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ग़ज़ल

है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में

ہے وصل ہجر عالمِ تمکین و ضبط میں
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: चाहिए

यह ग़ज़ल इश्क़ की विरोधाभासी प्रकृति को दर्शाती है, जहाँ मिलन और विरह भी संयम और धैर्य के दायरे में रहते हैं। इसमें महबूब के लिए आशिक़ की निडर आरज़ू को ख़ूबसूरती से चित्रित किया गया है, और आशिक़ को महबूब के प्रकट सौंदर्य का परदा बताया गया है। शेर यह भी इशारा करते हैं कि आरज़ू करने वालों को भौतिक सुखों के बजाय प्रकृति के नज़ारों में सुकून तलाशना चाहिए।

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1
है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में माशूक़-ए-शोख़ ओ आशिक़-ए-दीवाना चाहिए
आत्म-सम्मान और संयम के दायरे में मिलन और विरह दोनों मौजूद हैं। लेकिन प्रेम के लिए एक चंचल माशूक़ और एक दीवाना आशिक़ चाहिए।
2
उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ जुरअत-ए-रिंदाना चाहिए
हाँ, उन होठों से एक दिन चुंबन ज़रूर मिलेगा; बस एक व्यर्थ इच्छा और एक बेबाक दिलेरी चाहिए।
3
आशिक़ नाक़ाब-ए-जल्वा-ए-जानाना चाहिए फ़ानूस-ए-शम्अ' को पर-ए-परवाना चाहिए
प्रेमी को प्रेमिका के तेज पर परदा चाहिए। दीपक के शीशे को पतंगे का पंख चाहिए।
4
पैदा करें दिमाग़-ए-तमाशा-ए-सर्व-ओ-गुल हसरत-कशों को साग़र-ओ-मीना न चाहिए
हसरत-मंद लोगों को शराब के प्याले और सुराही की आवश्यकता नहीं है; उन्हें तो अपने मन में ही सरू और गुलाब के ख़ूबसूरत नज़ारे पैदा करने चाहिए।
5
दीवानगाँ हैं हामिल-ए-राज़-ए-निहान-ए-इश्क़ ऐ बे-तमीज़ गंज को वीराना चाहिए
जो प्रेमी दीवाने हैं, वे प्रेम के गहरे छिपे रहस्य को अपने अंदर समेटे हुए हैं। ऐ बे-तमीज़, एक खजाने को सुरक्षित रखने के लिए वीराने या एकांत की ज़रूरत होती है।
6
साक़ी बहार-ए-मौसिम-ए-गुल है सुरूर-बख़्श पैमाँ से हम गुज़र गए पैमाना चाहिए
हे साक़ी, फूलों का बसंत ऋतु आनंददायक है। हम अपनी प्रतिज्ञा से आगे निकल गए हैं, अब हमें पूरा प्याला चाहिए।
7
जादा है यार की रविश-ए-गुफ़्तुगू 'असद' याँ जुज़ फ़ुसूँ नहीं अगर अफ़्साना चाहिए
असद, प्रिय के बात करने का तरीका एक मार्ग है। यदि कोई कहानी चाहता है, तो यहाँ जादू के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।
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