न बंधे तिश्नगी-ए-ज़ौक़ के मज़मूँ 'ग़ालिब'
गरचे दिल खोल के दरिया को भी साहिल बाँधा
“Ghalib, unbound remained passion's thirsty themes,Though with open heart, even rivers were given shores.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
ऐ ग़ालिब, ज़ौक़ (इच्छा) की प्यास के विषय बंधे नहीं, हालाँकि खुले दिल से दरिया को भी किनारा (सीमा) बाँध दिया गया था।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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