का'बा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुम को मगर नहीं आती
“Ghalib, with what face will you go to the Kaaba? But it seems shame does not come to you.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
ग़ालिब, तुम किस मुँह से का'बा जाओगे? तुम्हें तो बिलकुल भी शर्म नहीं आती।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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