ग़ज़ल
मस्ती ब-ज़ौक़-ए-ग़फ़लत-ए-साक़ी हलाक है
مستی ب ذوقِ غفلتِ ساقی ہلاک ہے
यह ग़ज़ल जुनून और अतृप्त इच्छा के विरोधाभासी स्वरूप को दर्शाती है। यह दुख व्यक्त करती है कि साक़ी की लापरवाही से मस्ती कैसे तबाह हो जाती है, और दिल केवल प्रिय के नाज़ की तलवार से मिले ज़ख्म की ही आरज़ू करता है। प्रेमजनित जुनून की तीव्रता वास्तविकता को इतना विकृत कर देती है कि विशाल रेगिस्तान भी आँखों में धूल के एक मुट्ठी के समान प्रतीत होता है।
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1
मस्ती ब-ज़ौक़-ए-ग़फ़लत-ए-साक़ी हलाक है
मौज-ए-शराब यक-मिज़ा-ए-ख़्वाब-नाक है
साक़ी की ग़फ़लत के कारण मस्ती बर्बाद हो जाती है। शराब की लहर बस एक नींद भरी पलक झपकने जैसी ही है।
2
जुज़ ज़ख्म-ए-तेग़-ए-नाज़ नहीं दिल में आरज़ू
जेब-ए-ख़याल भी तिरे हाथों से चाक है
मेरे दिल में तुम्हारे नाज़ की तलवार के ज़ख़्म के सिवा कोई इच्छा नहीं है। मेरे ख़यालों का दामन भी तुम्हारे हाथों से फटा हुआ है।
3
जोश-ए-जुनूँ से कुछ नज़र आता नहीं 'असद'
सहरा हमारी आँख में यक-मुश्त-ए-ख़ाक है
जोश की दीवानगी में, असद, कुछ भी दिखाई नहीं देता। हमारी आँखों में तो रेगिस्तान भी बस मुट्ठी भर धूल जैसा लगता है।
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