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ग़ज़ल

क़तरा-ए-मय बस-कि हैरत से नफ़स-परवर हुआ

قطرہء مے بسکہ حیرت سے نفس پرور ہوا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 8 shers· radif: हुआ

यह ग़ज़ल प्रेम के अन्यायपूर्ण कष्टों को मार्मिक ढंग से दर्शाती है, जहाँ प्रेमी को दूसरों की ख़ताओं के लिए भी महबूब के क्रोध का सामना करना पड़ता है। यह दौलत के प्रतिष्ठा-नाशक प्रभाव और शराब की एक बूँद के अद्भुत परिवर्तन पर भी प्रकाश डालती है, जो मदहोशी के क्षणों के क्षणभंगुर आनंद के विपरीत है।

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1
क़तरा-ए-मय बस-कि हैरत से नफ़स-परवर हुआ ख़त्त-ए-जाम-ए-मै सरासर रिश्ता-ए-गौहर हुआ
शराब की बूँद हैरत से इस क़दर साँस रोके हुए थी कि शराब के प्याले का पूरा किनारा मोतियों की एक लड़ी बन गया।
2
ए'तिबार-ए-इश्क़ की ख़ाना-ख़राबी देखना ग़ैर ने की आह लेकिन वो ख़फ़ा मुझ पर हुआ
प्रेम पर विश्वास करने की बर्बादी देखिए: दुश्मन ने आह भरी, पर प्रिय मुझ पर क्रोधित हो गया।
3
गरमी-ए-दौलत हुइ आतिश-ज़न-ए-नाम-ए-निको ख़ाना-ए-ख़ातिम में याक़ूत-ए-नगीं अख़्तर हुआ
दौलत की गरमी अच्छे नाम को जलाने वाली बनी। अंगूठी के नगीने में याक़ूत एक सितारे में बदल गया।
4
नश्शा में गुम-कर्दा-राह आया वो मस्त-ए-फ़ित्ना-ख़ू आज रंग-रफ़्ता दौर-ए-गर्दिश-ए-साग़र हुआ
वह शरारती स्वभाव का शराबी, नशे में अपना रास्ता भूले हुए आया। आज, शराब के प्याले के चक्कर का रंग (रौनक) खत्म हो गया।
5
दर्द से दर-पर्दा दी मिज़्गाँ-सियाहाँ ने शिकस्त रेज़ा रेज़ा उस्तुख़्वाँ का पोस्त में नश्तर हुआ
दर्द के माध्यम से, उन काली पलकों वालों ने परदे के पीछे से हार दी। मेरी हर हड्डी का टुकड़ा त्वचा में नश्तर की तरह चुभने लगा।
6
ज़ोहद गरदीदन है गर्द-ए-ख़ाना-हा-ए-मुनइमाँ दाना-ए-तस्बीह से मैं मोहरा-दर-शश्दर हुआ
अब ज़ोहद सिर्फ़ अमीरों के घरों की धूल फाँकना बन गया है। तस्बीह के दाने ने ही मुझे एक ऐसी छह-तरफ़ा उलझन में फँसा दिया है।
7
ऐ ब-ज़ब्त-ए-हाल-ए-ना-अफ़्सुर्दागाँ जोश-ए-जुनूँ नश्शा-ए-मय है अगर यक-पर्दा नाज़ुक-तर हुआ
हे जुनून के जोश, जो ना-अफसुर्दा लोगों के आत्म-संयम में बसता है। यह शराब का नशा ही है, यदि वह एक पर्दा और अधिक नाज़ुक हो जाए।
8
इस चमन में रेशा-दारी जिस ने सर खेंचा 'असद' तर ज़बान-ए-लुत्फ़-ए-आम-ए-साक़ी-ए-कौसर हुआ
हे असद, इस संसार रूपी चमन में जिसने सांसारिक बंधनों से स्वयं को अलग किया, उसकी ज़बान साक़ी-ए-कौसर की आम कृपा से तर हो गई।
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