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ग़ज़ल

अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं

अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं

यह ग़ज़ल बताती है कि शायर का प्रेम और उसका दर्द सामान्य नहीं है; यह एक अनोखा और निराला अनुभव है। वह अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए दर्द को भी एक मीठी लज़्ज़त मानता है। शायर अपने प्रेम के बगीचे (चमन) को सींचने के लिए अपनी उम्मीदों और जिगर का ख़ून देने को तैयार है, भले ही उसे रात में ख़ामोशी और सितारों की उदासी का सामना करना पड़े।

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1
अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं ये आशिक़ कौन सी बस्ती के या-रब रहने वाले हैं
अनोखी वज़्अ है, जो सारे ज़माने से निराली है। ये आशिक़ कौन सी बस्ती के हैं, या रब, रहने वाले हैं।
2
इलाज-ए-दर्द में भी दर्द की लज़्ज़त पे मरता हूँ जो थे छालों में काँटे नोक-ए-सोज़न से निकाले हैं
दर्द के इलाज में भी मुझे दर्द के मज़ा पर मरना है, उन काँटों को भी जो छाल में थे, उन्हें सुई की नोक से निकाल दिया है।
3
फला-फूला रहे या-रब चमन मेरी उमीदों का जिगर का ख़ून दे दे कर ये बूटे मैं ने पाले हैं
हे रब, मेरे उम्मीदों का यह बाग खिलता रहे, मैंने इन पौधों को सींचा है, इसलिए मैं अपना जिगर का खून दे दूँगा।
4
रुलाती है मुझे रातों को ख़ामोशी सितारों की निराला इश्क़ है मेरा निराले मेरे नाले हैं
तारों की खामोशी मुझे रातों को रुलाती है, मेरा इश्क़ अनोखा है और मेरे नाले भी अनोखे हैं।
5
न पूछो मुझ से लज़्ज़त ख़ानमाँ-बर्बाद रहने की नशेमन सैकड़ों मैं ने बना कर फूँक डाले हैं
मुझसे यह मत पूछो कि लज़्ज़त के खानों में बर्बाद होने का कैसा नशा है, क्योंकि मैंने तो सैकड़ों ऐसे नशेमन (आनंद के दीपक) जलाकर बुझा दिए हैं।
6
नहीं बेगानगी अच्छी रफ़ीक़-ए-राह-ए-मंज़िल से ठहर जा ऐ शरर हम भी तो आख़िर मिटने वाले हैं
हे शरर, मंजिल के रास्ते पर साथी बनकर अकेलेपन में मत रहना; हम भी तो आखिरकार मिटने वाले हैं।
7
उमीद-ए-हूर ने सब कुछ सिखा रक्खा है वाइ'ज़ को ये हज़रत देखने में सीधे-साधे भोले भाले हैं
उमीद-ए-हूर ने वाइ'ज़ को सब कुछ सिखा दिया है; ये हज़रत देखने में बहुत सीधे और भोले-भाले लगते हैं।
8
मिरे अशआ'र ऐ 'इक़बाल' क्यूँ प्यारे न हों मुझ को मिरे टूटे हुए दिल के ये दर्द-अंगेज़ नाले हैं
मेरे अशआर ऐ 'इक़बाल', क्यूँ प्यारे न हों मुझ को। मेरे टूटे हुए दिल के ये दर्द-अंगेज़ नाले हैं।
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