बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ
कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर
“Why did you grant me the command of travel from the garden of paradise? The affairs of the world are long; now wait for me.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ। कार-ए-जहाँ दराज़ है, अब मिरा इंतज़ार कर।
विस्तार
यह शेर ज़िंदगी की राह और नियति के बारे में बात करता है। शायर सवाल करते हैं कि स्वर्ग (बग़-ए-बहिश्त) से उन्हें सफ़र का हुक्म क्यों मिला। और फिर वो कहते हैं कि दुनिया का काम (कार-ए-जहाँ) बहुत बड़ा है, और वो अब आपके इंतज़ार में हैं। यह एक गहरा तफ़कर है कि ज़िंदगी का सुकून अस्थायी होता है और हमें हमेशा कोशिश करते रहना चाहिए।
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