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ग़ज़ल

हुआ न ज़ोर से उस के कोई गरेबाँ चाक

हुआ न ज़ोर से उस के कोई गरेबाँ चाक

यह ग़ज़ल जीवन के संघर्षों और मानवीय नियति की जटिलताओं पर एक चिंतन है। कवि विभिन्न बिंबों का उपयोग करते हुए यह सवाल उठाते हैं कि क्या मनुष्य का अस्तित्व और उसकी भावनाएं केवल बाहरी परिस्थितियों या सामाजिक दबावों का परिणाम हैं। यह मानव मन की आंतरिक शक्ति और उसके आध्यात्मिक उत्थान की खोज करता है।

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1
हुआ न ज़ोर से उस के कोई गरेबाँ चाक अगरचे मग़रबियों का जुनूँ भी था चालाक
उससे ज़ोर लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ी, भले ही मग़रिबी लोगों का जुनून चालाक था।
2
मय-ए-यक़ीं से ज़मीर-ए-हयात है पुर-सोज़ नसीब-ए-मदरसा या रब ये आब-ए-आतिश-नाक
यकीन के मय से जीवन की आत्मा जल रही है, ऐ रब, इस विद्यालय के नसीब को आतिश के जल जैसा कर दे।
3
उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी के मुंतज़िर हैं तमाम ये कहकशाँ ये सितारे ये नील-गूँ अफ़्लाक
ये कहकशाँ, ये सितारे और ये नीले आकाश के सभी हिस्से, सब मिलकर धूल के मानव के उत्थान का इंतज़ार कर रहे हैं।
4
यही ज़माना-ए-हाज़िर की काएनात है क्या दिमाग़ रौशन ओ दिल तीरा ओ निगह बेबाक
क्या यह आज के ज़माने की कायनात है, या यह तुम्हारा रोशन दिमाग़, तुम्हारा दिल और तुम्हारी बेबाक निगाह है।
5
तू बे-बसर हो तो ये माना-ए-निगाह भी है वगरना आग है मोमिन जहाँ ख़स ओ ख़ाशाक
अगर तुम खाली हो, तो मेरी इस नज़रों को स्वीकार करो, वरना यह दुनिया एक जलता हुआ स्थान है, ऐ मोमिन, ऐ ख़स ओ ख़ाशाक।
6
ज़माना अक़्ल को समझा हुआ है मिशअल-ए-राह किसे ख़बर कि जुनूँ भी है साहिब-ए-इदराक
ज़माना समझता है कि अक़्ल ही रास्ता है, लेकिन किसे पता कि जुनून भी एहसास का मालिक है।
7
जहाँ तमाम है मीरास मर्द-ए-मोमिन की मिरे कलाम पे हुज्जत है नुक्ता-ए-लौलाक
जहाँ तमाम है मीरास मर्द-ए-मोमिन की, मिरे कलाम पे हुज्जत है नुक्ता-ए-लौलाक। इसका अर्थ है कि जहाँ सच्चे और ईमानदार पुरुषों की विरासत है, वहीं मेरे कलाम पर उस निर्णायक बिंदु का प्रमाण है जहाँ से कोई वापसी संभव नहीं।
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