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चल ऐ मेरी ग़रीबी का तमाशा देखने वाले
वो महफ़िल उठ गई जिस दम तो मुझ तक दौर-ए-जाम आया

Oh, the gathering of those who watched the spectacle of my poverty, It left the gathering the moment the era of the wine reached me.

अल्लामा इक़बाल
अर्थ

ऐ मेरी ग़रीबी का तमाशा देखने वाले, वह महफ़िल उठ गई जिस दम मुझ तक दौर-ए-जाम आया।

विस्तार

यह शेर हमें भीड़ के असली चेहरे से रूबरू कराता है। शायर कहते हैं कि लोग तो महफ़िल में सिर्फ़ हमारे 'तमाशे' को देखने आते हैं—हमारी ग़रीबी को। लेकिन जिस पल हमें अपनी पहचान मिलती है, जिस पल हमें अपना 'दौर-ए-जाम' मिलता है, वो महफ़िल ऐसे उठ जाती है, जैसे वो कभी थी ही नहीं। यह इंसानी रिश्तों की सच्चाई है।

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