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यूँ दाद-ए-सुख़न मुझ को देते हैं इराक़ ओ पारस
ये काफ़िर-ए-हिन्दी है बे-तेग़-ओ-सिनाँ ख़ूँ-रेज़

As if Iraq and Persia give me the favor of poetry, This Hindu infidel is a blood-shedding, untamed man.

अल्लामा इक़बाल
अर्थ

जैसे इराक और पारस मुझे शायरी का एहसान देते हैं, यह हिंदू काफ़िर बिना लगाम और बिना सिनाँ रक्तपात करने वाला है।

विस्तार

इस शेर में, अल्लामा इकबाल साहित्य के माहौल की बात कर रहे हैं। वह कहते हैं कि दुनिया, यानी शायरी की महफ़िल, उन्हें 'सुख़न का नectar' देती है, जिसकी प्रेरणा उन्हें इराक और पारस जैसी महान सभ्यताओं से मिलती है। लेकिन फिर उनका ध्यान स्थानीय हालात पर जाता है। वह एक 'काफ़िर-ए-हिन्दी' की आलोचना करते हैं। वह इस व्यक्ति को एक ख़तरा बताते हैं—एक ऐसा व्यक्ति जो खून बहाता है, लेकिन जिसके पास न कोई तलवार है और न कोई ढाल, जो एक अंदरूनी, सूक्ष्म खतरे का प्रतीक है।

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