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માણસ થૈ સંપી જીવવાનું પાપ કદાપિ ન કરશું રે. –હિન્દી જન.
ચિર રોગી ને ઝપટ રહિત છે, હામ હોશ કરે ઘોળ્યાં રે

As humans, let's never commit the sin of disunity, says the Hindi folk. Else chronically sick, and devoid of speed, our courage and our senses would dissolve.

ज़वेરचंद मेघानी
अर्थ

हिंदी जन कहते हैं कि मनुष्य होकर हमें कभी भी एकता में न रहने का पाप नहीं करना चाहिए। अन्यथा, हम चिर रोगी और गतिहीन होकर अपना साहस और होश खो देंगे।

विस्तार

यह दोहा मानवीय स्वभाव पर एक मार्मिक, व्यंग्यात्मक टिप्पणी प्रस्तुत करता है। पहली पंक्ति, 'इंसान होकर हम कभी भी मिल-जुलकर रहने का पाप नहीं करेंगे,' हमारी एकता के बजाय कलह की ओर झुकाव को उजागर करती है। यह इस बात पर एक कटु चिंतन है कि हम कितनी बार शांति के ऊपर संघर्ष को चुनते हैं। दूसरी पंक्ति फिर इस असामंजस्य के परिणामों का वर्णन करती है: चिर रोगी की अवस्था, शायद निरंतर कष्ट या कमजोरी का रूपक। यह कहता है कि हम सुस्त और अप्रभावी हो जाते हैं, अपनी प्रेरणा और विचारों की स्पष्टता खो देते हैं। संक्षेप में, कवि सुझाव देते हैं कि शांतिपूर्वक एक साथ रहने में हमारी अक्षमता हमें स्थायी पीड़ा, भ्रम और हमारी महत्वपूर्ण आत्मा के नुकसान की ओर ले जाती है।

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