ग़ज़ल

कभी शाख़ ओ सब्ज़ा ओ बर्ग पर कभी ग़ुंचा ओ गुल ओ ख़ार पर

کبھی شاخ و سبزہ و برگ پر کبھی غنچہ و گل و خار پر
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 9 shers· radif: पर

यह ग़ज़ल स्वाभिमान, अदम्य साहस और प्रतिकूल परिस्थितियों के विरुद्ध खड़े रहने के दृढ़ संकल्प को व्यक्त करती है। शायर ज़ोर देकर कहता है कि चाहे संकटों की कितनी भी बिजलियाँ उसके आशियाने पर गिरें, बहार की खुशियों और अपनी आज़ादी पर उसका पूरा अधिकार है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
कभी शाख़ ओ सब्ज़ा ओ बर्ग पर कभी ग़ुंचा ओ गुल ओ ख़ार पर मैं चमन में चाहे जहाँ रहूँ मिरा हक़ है फ़स्ल-ए-बहार पर
चाहे मैं डाली, हरियाली और पत्तों पर रहूँ या कली, फूल और काँटों पर; मैं बाग़ में चाहे जहाँ भी रहूँ, बहार के मौसम पर मेरा पूरा अधिकार है।
2
मुझे दें न ग़ैज़ में धमकियाँ गिरें लाख बार ये बिजलियाँ मिरी सल्तनत ये ही आशियाँ मिरी मिलकियत ये ही चार पर
मुझे गुस्से में धमकियाँ न दें, चाहे ये बिजलियाँ लाख बार गिरें। मेरा साम्राज्य बस यही आशियाना है और मेरी कुल दौलत सिर्फ़ ये चंद पंख हैं।
3
जिन्हें कहिए इश्क़ की वुसअ'तें जो हैं ख़ास हुस्न की अज़्मतें ये उसी के क़ल्ब से पूछिए जिसे फ़ख़्र हो ग़म-ए-यार पर
इश्क़ की विशालता और हुस्न की वास्तविक महानता के बारे में केवल उसी व्यक्ति के दिल से पूछना चाहिए जिसे महबूब के दिए हुए ग़म पर नाज़ हो।
4
मिरे अश्क-ए-ख़ूँ की बहार है कि मुरक़्क़ा-ए-ग़म-ए-यार है मिरी शाइ'री भी निसार है मिरी चश्म-ए-सेहर-निगार पर
क्या यह मेरे ख़ूनी आँसुओं की बहार है या महबूब के ग़म की कोई तस्वीर? मेरी शायरी भी मेरी इस जादू जैसी चित्रकारी करने वाली आँख पर न्योछावर है।
5
अजब इंक़िलाब-ए-ज़माना है मिरा मुख़्तसर सा फ़साना है यही अब जो बार है दोश पर यही सर था ज़ानू-ए-यार पर
ज़माने का कैसा अजीब बदलाव है और मेरी संक्षिप्त कहानी बस यही है कि जो सिर आज कंधों पर बोझ बना हुआ है, वही कभी महबूब की गोद में हुआ करता था।
6
ये कमाल-ए-इश्क़ की साज़िशें ये जमाल-ए-हुस्न की नाज़िशें ये इनायतें ये नवाज़िशें मिरी एक मुश्त-ए-ग़ुबार पर
इश्क़ के कमाल की ये साज़िशें, हुस्न के जमाल के ये नाज़-ओ-अंदाज़, और ये सारी इनायतें और मेहरबानियाँ मुझ जैसे सिर्फ़ एक मुट्ठी ख़ाक (मामूली वजूद) पर बरसाई जा रही हैं।
7
मिरी सम्त से उसे ऐ सबा ये पयाम-ए-आख़िर-ए-ग़म सुना अभी देखना हो तो देख जा कि ख़िज़ाँ है अपनी बहार पर
ऐ सुबह की हवा, मेरी तरफ़ से उसे मेरे ग़म का यह आख़िरी पैग़ाम पहुँचा दे कि अगर मुझे देखना है तो अभी आकर देख ले, क्योंकि मेरी ख़िज़ाँ (बर्बादी) अपने चरम पर है।
8
ये फ़रेब-ए-जल्वा है सर-ब-सर मुझे डर ये है दिल-ए-बे-ख़बर कहीं जम न जाए तिरी नज़र इन्हीं चंद नक़्श ओ निगार पर
यह सब पूरी तरह से दिखावे का धोखा है, ऐ बेख़बर दिल! मुझे बस यह डर है कि कहीं तुम्हारी नज़र इन्हीं चंद बाहरी नक़्श-ओ-निगार पर ही न अटक कर रह जाए।
9
मैं रहीन-ए-दर्द सही मगर मुझे और चाहिए क्या 'जिगर' ग़म-ए-यार है मिरा शेफ़्ता मैं फ़रेफ़्ता ग़म-ए-यार पर
ऐ जिगर, भले ही मैं दर्द में जकड़ा हुआ हूँ, पर मुझे इसके सिवा और क्या चाहिए? महबूब का ग़म मुझ पर फ़िदा है और मैं महबूब के ग़म पर आशिक़ हूँ।
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