ग़ज़ल

ये मिस्रा काश नक़्श-ए-हर-दर-ओ-दीवार हो जाए

یہ مصرع کاش نقش ہر در و دیوار ہو جائے
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 10 shers· radif: हो जाए

यह ग़ज़ल जीवन के निडर और गरिमामय दर्शन को प्रस्तुत करती है, जहाँ सच्चे अर्थों में जीने के लिए बलिदान और मृत्यु के लिए तैयार रहना अनिवार्य माना गया है। इसमें प्रेम, संघर्ष और रूहानी खुमारी के जज़्बे को बेहद ओजस्वी अंदाज़ में बयाँ किया गया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
ये मिस्रा काश नक़्श-ए-हर-दर-ओ-दीवार हो जाए जिसे जीना हो मरने के लिए तय्यार हो जाए
काश यह पंक्ति हर दरवाज़े और दीवार पर अंकित हो जाए कि जिसे भी जीना है, उसे मरने के लिए तैयार रहना चाहिए।
2
वही मय-ख़्वार है जो इस तरह मय-ख़्वार हो जाए कि शीशा तोड़ दे और बे-पिए सरशार हो जाए
सच्चा शराबी वही है जो इस तरह शराब पिए कि वह जाम तोड़ दे और बिना पिए ही मदहोश हो जाए।
3
दिल-ए-इंसाँ अगर शाइस्ता-ए-असरार हो जाए लब-ए-ख़ामोश-फ़ितरत ही लब-ए-गुफ़्तार हो जाए
यदि मनुष्य का हृदय रहस्यों को समझने के योग्य बन जाए, तो प्रकृति के मौन होंठ ही बोलने वाले होंठ बन जाएँ अर्थात् प्रकृति स्वयं बात करने लगे।
4
हर इक बे-कार सी हस्ती ब-रू-ए-कार हो जाए जुनूँ की रूह-ए-ख़्वाबीदा अगर बेदार हो जाए
यदि जुनून की सोई हुई आत्मा जाग उठे, तो हर व्यर्थ प्रतीत होने वाला जीवन भी सक्रिय और उपयोगी बन जाए।
5
सुना है हश्र में हर आँख उसे बे-पर्दा देखेगी मुझे डर है न तौहीन-ए-जमाल-ए-यार हो जाए
सुना है कि कयामत के दिन हर आँख महबूब को बिना पर्दे के देखेगी, लेकिन मुझे डर है कि कहीं इससे मेरे महबूब के हुस्न की तौहीन (अपमान) न हो जाए।
6
हरीम-ए-नाज़ में उस की रसाई हो तो क्यूँकर हो कि जो आसूदा ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार हो जाए
जो व्यक्ति केवल बाहरी दीवार की छाँव में ही रहकर संतुष्ट हो जाए, उसकी पहुँच महबूब के पवित्र आँगन या ख़ास महल तक भला कैसे हो सकती है?
7
मआ'ज़-अल्लाह उस की वारदात-ए-ग़म मआ'ज़-अल्लाह चमन जिस का वतन हो और चमन-बे-ज़ार हो जाए
ईश्वर रक्षा करे, उसके दुःख की कैसी त्रासदी है कि जिसका घर बाग़ रहा हो, वही अपने बाग़ से तंग आकर उदास या विरक्त हो जाए।
8
यही है ज़िंदगी तो ज़िंदगी से ख़ुद-कुशी अच्छी कि इंसाँ आलम-ए-इंसानियत पर बार हो जाए
अगर ज़िंदगी यही है कि इंसान पूरी इंसानियत पर बोझ बन जाए, तो ऐसी ज़िंदगी से बेहतर ख़ुदकुशी है।
9
इक ऐसी शान पैदा कर कि बातिल थरथरा उट्ठे नज़र तलवार बन जाए नफ़स झंकार हो जाए
अपने अंदर ऐसी शान और प्रभाव पैदा करो कि असत्य थरथरा उठे, तुम्हारी नज़र तलवार बन जाए और तुम्हारी हर सांस तलवार की झंकार बन जाए।
10
ये रोज़ ओ शब ये सुब्ह ओ शाम ये बस्ती ये वीराना सभी बेदार हैं इंसाँ अगर बेदार हो जाए
ये दिन-रात, सुबह-शाम, बस्तियां और वीराने सब जाग रहे हैं; सब कुछ सचेत है, बस अगर इंसान भी जागरूक हो जाए।
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