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सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहार। होले-होले सुरत में , कहैं कबीर विचार॥ 111॥

As if you pour water from a pitcher, remember me. Slowly, slowly, Kabir ponders in your beauty.

कबीर
अर्थ

सुमिरन की बूंदों को ऐसे बरसाओ, जैसे एक घड़े से पानी बरसाता है। धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, शायर तुम्हारे रूप में विचार करता है।

विस्तार

कबीर दास जी इस दोहे में बताते हैं कि ईश्वर का सुमिरन या याद ऐसे करो, जैसे पनिहारिन घड़े से धीरे-धीरे पानी उढ़ेलती है। यह याद कोई जल्दबाजी का काम नहीं, बल्कि धीरे-धीरे और लगातार होनी चाहिए। जब ऐसे लगातार और सहजता से ध्यान लगता है, तो मन खुद-ब-खुद उस याद में डूबने लगता है और हमें गहरी शांति मिलती है। यह हमें सिखाता है कि भक्ति और ध्यान में धैर्य और निरंतरता कितनी ज़रूरी है।

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