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जहर की जर्मी में है रोपा , अभी खींचे सौ बार। कबिरा खलक न तजे , जामे कौन विचार॥ 116॥

In the seed of poison, it has been planted, which will be pulled a hundred times. Who can think of a detachment from the cycle of birth and death, O Kabir's world?

कबीर
अर्थ

जहर के बीज में रोपा गया है, जिसे सौ बार खींचा जाएगा। ओ कबीर की दुनिया, जन्म और मृत्यु के चक्र से कौन मुक्ति का विचार कर सकता है।

विस्तार

यह दोहा जीवन के गहरे दर्शन को खूबसूरती से समझाता है। कबीरदास जी कहते हैं कि हमारा अस्तित्व तो मानो ज़हर की ज़मीन में बोया गया एक पौधा है, जिसे हम बार-बार खींचते हैं, यानी जन्म-मरण के चक्र में फँसे रहते हैं और बार-बार दुख झेलते हैं। इस संसार से मोह माया का त्याग करना इतना कठिन है कि भला कौन इसके विछोह का विचार भी कर सकता है? यह हमें हमारी सांसारिक उलझनों और उनसे मुक्ति की असंभवता का एहसास कराता है।

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