“One who associates with the company of ascetics, And eats only the husk of mustard seeds. If he gets food like sweet rice and sugar, He does not associate with such people.”
कबीरा कहते हैं कि साधु की संगति जो जौ की भूसी खाने वाले साधु के समान है, वह खीर और खाँड़ जैसे स्वादिष्ट भोजन से भी नहीं मिल सकती।
कबीर दास जी यहाँ साधु संगति और वैराग्य के महत्व को बड़े सुंदर ढंग से समझाते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति जौ की भूसी जैसा सादा भोजन खाकर भी सच्चे साधु की संगति में रहता है, उसे यदि स्वादिष्ट खीर-खाँड़ जैसा भोजन मिले तब भी वह ऐसी सांसारिक संगति में नहीं जाता। यह हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक सुख और सच्ची संगति दुनियावी भोग-विलास से कहीं बढ़कर हैं, और एक बार जब हमें उनका स्वाद लग जाता है, तो हम छोटी चीज़ों की ओर मुड़कर नहीं देखते।
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
