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काया काढ़ा काल घुन , जतन-जतन सो खाय। काया बह्रा ईश बस , मर्म न काहूँ पाय॥ 161॥

The body, the pot, the time, the gnawer, by effort, effort, all consume. The body, the deaf lord, merely resides; the essence is not to be found.

कबीर
अर्थ

शरीर (काया) एक घड़ा है, जिसे समय (काल) और अन्य तत्व लगातार खाते रहते हैं। यह शरीर तो बस एक माध्यम है, और इसका सार या मर्म कहीं नहीं मिल पाता।

विस्तार

कबीर दास जी इस दोहे में शरीर की नश्वरता को बहुत खूबसूरती से समझाते हैं। वे कहते हैं कि यह काया एक कच्चे घड़े जैसी है और समय रूपी घुन इसे धीरे-धीरे खा रहा है। लाख कोशिशों के बावजूद हम इसे बचा नहीं सकते, क्योंकि यह शरीर सिर्फ एक निवास स्थान है और असली मर्म या ईश्वर का वास इसमें नहीं बल्कि इससे परे है। यह हमें याद दिलाता है कि हमें भौतिक चीज़ों से मोह नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि वास्तविक सत्य कुछ और ही है।

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