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राम नाम चीन्हा नहीं , कीना पिंजर बास। नैन न आवे नीदरौं , अलग न आवे भास॥ 229॥

The name of Ram is not marked, nor is the cage built. My eyes do not find sleep, nor does my mind find rest.

कबीर
अर्थ

राम नाम को किसी चिन्ह से नहीं, न ही किसी पिंजरे में बसना है। मेरी आँखें नींद से नहीं आतीं, और मेरा मन भी शांति से नहीं आता।

विस्तार

यह दोहा उस अवस्था को बताता है जहाँ मन प्रभु राम के नाम को पहचान नहीं पाता या उन्हें किसी पिंजरे में कैद नहीं कर पाता। कबीर दास जी कहते हैं कि जब हृदय में ऐसी सच्ची लगन लग जाती है, तो न तो आँखों को नींद आती है और न ही मन को कहीं और चैन मिलता है। यह बेचैनी किसी दुख की नहीं, बल्कि परमात्मा से मिलने की गहरी चाहत और प्रेम की निशानी है, जो हमें बाहरी दुनिया से विरक्त कर देती है।

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