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ना गुरु मिल्या न सिष भया , लालच खेल्या डाव। दुन्यू बूड़े धार में , चढ़ि पाथर की नाव॥ 244॥

Neither the master nor the disciple was found, the game was played with greed. In the stream of the two worlds, the boat of stone crossed.

कबीर
अर्थ

न गुरु मिले न शिष्य हुआ, लालच से खेला दाँव। दो जहानों की धारा में, पत्थर की नाव चली।

विस्तार

कबीर दास जी इस दोहे में बताते हैं कि जब हम लालच के खेल में फंस जाते हैं, तो न हमें सच्चा गुरु मिल पाता है और न हम सच्चे शिष्य बन पाते हैं। ऐसे में जीवन की धारा में हम डूब जाते हैं, क्योंकि लालच की बुनियाद पर बनी कोई भी नाव 'पत्थर की नाव' जैसी ही होती है, जो डूबना तय है। यह हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर ईमानदारी और निर्मल हृदय ही सबसे ज़रूरी है।

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