Sukhan AI
बिरह-भुवगम तन बसै मंत्र न लागै कोइ। राम-बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होइ॥ 253॥ यह तन जालों मसि करों , लिखों राम का नाउं। लेखणि करूं करंक की , लिखी-लिखी राम पठाउं॥ 254॥

In this body, the memory of separation resides; no spell can take hold. One who is separated from Rama cannot live; he goes mad. Let this body be a canvas, let me write Rama's name upon it. I will write the name of the lotus (or peacock) and recite Rama's glories.

कबीर
अर्थ

इस तन में विरह के भाव बसे हैं, कोई भी मंत्र असर नहीं करता। जो राम से बिछुड़ा है, वह जी नहीं सकता और पागल हो जाता है। मैं इस शरीर को एक जालो (canvas) बनाना चाहता हूँ और इस पर राम का नाम लिखूंगा। मैं करंक (कमल) का नाम लिखकर और उसे सुनाकर राम की महिमा का वर्णन करूंगा।

विस्तार

यह दोहा कहता है कि प्रभु राम से विरह का दर्द इतना गहरा है, जैसे शरीर में किसी विषैले सर्प का वास हो, जिस पर कोई मंत्र असर नहीं करता। जो राम से बिछड़ गया है, वह जीवित नहीं रह सकता, और यदि जीता भी है तो पागल हो जाता है। कवि अपनी भक्ति की पराकाष्ठा दिखाते हुए कहते हैं कि मैं अपने शरीर को जलाकर उसकी राख से स्याही बनाऊँगा, और अपनी हड्डियों की कलम बनाकर बार-बार राम का नाम लिखूँगा। यह तन-मन से पूर्ण समर्पण और अटूट प्रेम का भाव है, जहाँ हर साँस राम नाम को समर्पित है।

ऑडियो

पाठ
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