Sukhan AI
लच्छ कोष जो गुरु बसै , दीजै सुरति पठाय। शब्द तुरी बसवार है , छिन आवै छिन जाय॥ 441॥

Where the Guru resides in the Lacchha (sacred thread), grant me the wisdom to learn. The word (speech) is ever-present, it comes and goes in moments.

कबीर
अर्थ

जहाँ गुरु लच्छ में बसते हैं, मुझे सीखने की बुद्धि प्रदान करें। वाणी (शब्द) हमेशा मौजूद रहती है, यह पल-पल आती और चली जाती है।

विस्तार

यह दोहा गुरु के महत्व और वाणी की क्षणभंगुरता को बहुत खूबसूरती से बताता है। जब कबीर कहते हैं कि गुरु लच्छ कोष में बसते हैं, तो उनका इशारा है कि सच्चा ज्ञान बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही गहरे में छिपा है। वे समझाते हैं कि वाणी, यानी हमारे शब्द, घोड़े की तरह हमेशा तैयार रहते हैं पर पल भर में आते हैं और चले जाते हैं, जो उनकी क्षणिक प्रकृति दर्शाता है। यह हमें बाहरी बातों से हटकर अपने भीतर के गुरु से जुड़ने और भीतरी ज्ञान की ओर ध्यान देने की प्रेरणा देता है।

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पाठ
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