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कहैं कबीर जजि भरम को , नन्हा है कर पीव। तजि अहं गुरु चरण गहु , जमसों बाचै जीव॥ 454॥

Kabir says, leaving the illusion, the small cup of wine. Leaving the ego, I take the Guru's steps; thus the soul survives.

कबीर
अर्थ

कबीर कहते हैं कि भ्रम को त्याग देना और छोटे से प्याले (या मोह) को छोड़ देना चाहिए। अहंकार को त्याग कर गुरु के चरणों को ग्रहण करने से जीव (आत्मा) निश्चित रूप से बच जाता है।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ समझा रहे हैं कि जैसे हम भ्रम के छोटे से प्याले को छोड़ देते हैं, वैसे ही हमें अपने अहंकार को भी त्याग देना चाहिए। गुरु के चरणों में शरण लेने से ही हमारी आत्मा मृत्यु के भय से मुक्त हो सकती है। यह दिखाता है कि बाहरी दुनिया और 'मैं' का भाव कितना क्षणभंगुर है, और सच्चे मार्गदर्शन में ही जीवन का उद्धार है।

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