डूबा औघट न तरै , मोहिं अंदेशा होय। लोभ नदी की धार में , कहा पड़ो नर सोइ॥ 478॥
“He who drowns in the mighty current, I fear he will not cross. In the stream of greed, where can a man possibly go?”
— कबीर
अर्थ
जो व्यक्ति शक्तिशाली धारा में डूब जाता है, मुझे डर है कि वह पार नहीं कर पाएगा। लोभ की नदी की धार में, मनुष्य कहाँ जा सकता है।
विस्तार
अच्छा, ये दोहे हमें क्या सिखाते हैं? कबीर दास जी यहाँ लोभ को एक ऐसी नदी की तरह बता रहे हैं जिसकी धारा इतनी प्रबल है कि अगर कोई इसमें एक बार फँस जाए, तो उसका पार पाना लगभग असंभव है। वो बड़ी चिंता से कहते हैं कि लालच की इस गहरी नदी में गिरकर इंसान कहाँ जाएगा, उसका कोई ठिकाना नहीं। यह हमें समझाते हैं कि दुनियावी चीज़ों के मोह और लालच से हमें बचना चाहिए, क्योंकि ये हमें बस भटकाते ही हैं।
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