ग़ज़ल
कबीर संग्रह 41-50
کبیر مجموعہ 41-50
कबीर के इस संग्रह में बाहरी रीति-रिवाजों की बजाय हृदय की सच्ची भक्ति पर ज़ोर दिया गया है। कबीरदास जी बताते हैं कि आंतरिक शुद्धता और ईश्वर में अटूट विश्वास ही आध्यात्मिक मुक्ति दिलाता है, जो सांसारिक सीमाओं और नश्वर सुंदरता से परे है। वे पारंपरिक बंधनों और आसक्तियों को त्यागकर गहन आत्मज्ञान प्राप्त करने की वकालत करते हैं।
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1
अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट। चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट॥ 42॥
शरीर में फंसा हुआ धनुष का तार टूट रहा है। चुंबक के बिना यह एक करोड़ नगरों को फाड़ नहीं सकता।
2
कबीरा जपना काठ की , क्या दिख्लावे मोय। ह्रदय नाम न जपेगा , यह जपनी क्या होय॥ 43॥
कबीरा, काठ की माला से मुझे क्या दिखाई देगा? मेरा हृदय नाम नहीं जपेगा; यह जपनी क्या चीज़ है।
3
पतिवृता मैली , काली कुचल कुरूप। पतिवृता के रूप पर , वारो कोटि सरूप॥ 44॥ बैध मुआ रोगी मुआ , मुआ सकल संसार। एक कबीरा ना मुआ , जेहि के राम अधार॥ 45॥
पतिवृता मैली, काली कुचल कुरूप। पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप। (अर्थात, पत्नी से सजी, गंदी, काली और कुरूप। पत्नी के रूप पर, करोड़ों रूप व्यय होते हैं।) बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार। एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार। (अर्थात, वैद्य, मरा, रोगी, मरा, सारा संसार। एक कबीरा नहीं मरा, जिसका निवास राम में है।)
4
हर चाले तो मानव , बेहद चले सो साध। हद बेहद दोनों तजे , ताको भता अगाध॥ 46॥
मनुष्य के चलने में कोई सीमा नहीं होती, और साधु के चलने में भी कोई सीमा नहीं होती। जो व्यक्ति इन दोनों सीमाओं और असीम को भी त्याग देता है, उसका आनंद बहुत गहरा होता है।
5
राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस। रहे कबीर पाखण्ड सब , झूठे सदा निराश॥ 47॥
चाहे राम वन में रहें या गुरु की पूजा में आस, कबीर कहते हैं कि सब पाखण्ड झूठे हैं और सदा निराश करते हैं।
6
जाके जिव्या बन्धन नहीं , ह्र्दय में नहीं साँच। वाके संग न लागिये , खाले वटिया काँच॥ 48॥
जिन लोगों का जीवन बंधनों से नहीं है और जिनके हृदय में सच्चाई नहीं है, उनसे आसक्ति न करें। उनसे दूर रहना ही बेहतर है, क्योंकि वे टूटे हुए काँच के समान हैं।
7
तीरथ गये ते एक फल , सन्त मिले फल चार। सत्गुरु मिले अनेक फल , कहें कबीर विचार॥ 49॥
तीर्थ जाने से केवल एक फल मिलता है, संत से चार फल मिलते हैं, और सच्चे गुरु से अनगिनत फल मिलते हैं, ऐसा शायर कबीर कहते हैं।
8
सुमरण से मन लाइए , जैसे पानी बिन मीन। प्राण तजे बिन बिछड़े , सन्त कबीर कह दीन॥ 50॥ ~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
सुमिरन से मन को लाओ, जैसे पानी के बिना मछली। आत्मा से अलग होने पर, संत कबीर कहते हैं।
9
हंसा मोती विण्न्या , कुञ्च्न थार भराय। जो जन मार्ग न जाने , सो तिस कहा कराय॥ 52॥
हंसा मोती से सुशोभित है और कुञ्चन में थार (भरपूर) है। जो व्यक्ति मार्ग को नहीं जानता, उसे कौन राह दिखा सकता है।
10
कहना सो कह दिया , अब कुछ कहा न जाय। एक रहा दूजा गया , दरिया लहर समाय॥ 53॥
मैंने जो कहना था, वह कह दिया; अब कुछ और नहीं कहा जा सकता। एक रहा और दूसरा चला गया, जैसे नदी की लहरें समा गई हों।
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