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जहाँ ग्राहक तँह मैं नहीं , जँह मैं गाहक नाय। बिको न यक भरमत फिरे , पकड़ी शब्द की छाँय॥ 197॥

Where I am not a customer, where I am not a buyer. I won't sell even a single piece, wandering, holding the shadow of words.

कबीर
अर्थ

जहाँ मैं ग्राहक नहीं हूँ, जहाँ मैं बाज़ार नहीं हूँ। मैं एक भी चीज़ नहीं बेचूंगा, जो बस भटक रही है, शब्दों की परछाई पकड़े हुए।

विस्तार

अरे देखो, कबीर दास जी कितनी गहरी बात कह रहे हैं यहाँ! वे कहते हैं कि उनका अपना अस्तित्व इस खरीदने-बेचने की दुनिया से बिल्कुल अलग है। न तो वे ग्राहक हैं और न ही कोई ऐसी चीज़ जिसे बेचा जा सके। वे तो बस शब्दों की उस गहरी छाया, यानी सत्य या नाम को थामे हुए घूमते रहते हैं, जिसे कोई मोल नहीं दे सकता। यह हमें समझाता है कि हमारी असली कीमत या ज्ञान किसी भौतिक लेन-देन से कहीं ऊपर है, जो हमें सांसारिक मोह-माया से आज़ाद कर देता है।

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