“What need for repentance, O 'Mariz', when in such ecstatic sway? The goblet slips from hand, unsaid, and simply falls away.”
ऐ 'मरीज़', तौबा की क्या ज़रूरत है, जब मस्ती के आलम में सागर (शराब का प्याला) हाथ से बिना कहे छूट जाता है।
यह खूबसूरत शेर 'मरीज़' कहते हैं कि पश्चाताप करने या किसी चीज़ को छोड़ने का संकल्प लेने की क्या ज़रूरत है। जब आप वास्तव में किसी गहरे नशे में या आध्यात्मिक मस्ती में डूब जाते हैं, तो चीजें अपने आप हो जाती हैं। शराब का प्याला, या जो कुछ भी आप पकड़े हुए हैं, वह आपके हाथ से बिना कुछ कहे ही छूट जाता है। यह खुद को कुछ भी छोड़ने के लिए मजबूर करने के बारे में नहीं है; बल्कि यह एक ऐसी स्थिति तक पहुँचने के बारे में है जहाँ लगाव अनायास ही भंग हो जाते हैं। यह एक गहरी अनुभूति को दर्शाता है जहाँ पुरानी आदतों या इच्छाओं की आवश्यकता अपने आप गायब हो जाती है।
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