बू कि हो सू-ए-बाग़ निकले है
बाव से इक दिमाग़ निकले है
“From the garden, a fragrance has emerged, From the womb, a mind has blossomed.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
शायर पूछ रहा है कि ये खुशबू बाग़ से आई है, और दिमाग़ वतन से निकला है।
विस्तार
देखिए, शायर साहब यहाँ बता रहे हैं कि किसी महक या याद का असर कितना गहरा होता है। यह महक इतनी तीव्र है कि लगता है जैसे बाग़ से ही निकल आई हो। और जो दिमाग़ का पागलपन, जो बेचैनी पैदा होती है... वो भी ऐसा महसूस होता है, जैसे वो हमारी रूह के अंदर से ही पैदा हुआ हो। यह इश्क़ की एक ऐसी ज़बरदस्त ताकत है, जो हमें बेकाबू कर देती है।
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