शायद उस ज़ुल्फ़ से लगी है 'मीर'
बाव में इक दिमाग़ निकले है
“Perhaps from that tresses, O Meer, A mind has sprung forth in the rain.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
शायद उस ज़ुल्फ़ से लगी है 'मीर' बाव में इक दिमाग़ निकले है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि शायद उस ज़ुल्फ़ (केश) के स्पर्श से 'मीर' के बाव (मन/चित्त) में कोई विचार उत्पन्न हुआ है।
विस्तार
यह शेर महबूब की ज़ुल्फ़ों के जादू को बयान करता है। शायर मिर् तक़ी मीर कहते हैं कि यह पागलपन, यह बेचैनी... यह किसी बाहरी चीज़ से नहीं, बल्कि महबूब की ज़ुल्फ़ों के जादू से उपजी है। यह इश्क़ का वह नशा है, जहाँ इंसान अपनी समझदारी खो बैठता है।
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