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सुब्ह-ए-पीरी शाम होने आई 'मीर'
तू न चेता याँ बहुत दिन कम रहा

The morning of the saintly woman came as the evening; 'Mir', you did not warn, and many days passed.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

सुब्ह-ए-पीरी शाम होने आई, ऐ मीर। तू न चेता याँ बहुत दिन कम रहा। (अर्थात्, जब संत स्त्री का सुबह का समय शाम जैसा हो गया, तब भी हे मीर, तुमने चेतावनी नहीं दी और बहुत दिन बीत गए।)

विस्तार

यह शेर वक़्त के गुज़रने के दर्द को बयां करता है। मीर कहते हैं कि जीवन की सुबह, शाम की तरह आ गई है। इसका मतलब है कि जवानी का दौर और बुढ़ापे का साया... एक ही पल में आ गए हैं। शायर हमें चेतावनी दे रहे हैं कि हम इतने मशगूल ज़िंदगी में हैं कि हमें यह एहसास ही नहीं हुआ कि हमारे दिन बहुत कम रह गए हैं। यह वक़्त की नज़ाकत और गुज़रते लम्हों पर एक गहरा तफ़कर है।

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पाठ
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