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जागह से भी जाते हो मुँह से भी ख़शिन हो कर
वे हर्फ़ नहीं हैं जो शायान निकलते हैं

You depart even from the place, and become sour from the mouth, They are not the letters that can be uttered.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

जागह से भी जाते हो, मुँह से भी ख़शिन हो कर, वे हर्फ़ नहीं हैं जो शायर निकलते हैं।

विस्तार

यह शेर जुदाई के दर्द को बहुत गहराई से बयां करता है। शायर कह रहे हैं कि महबूब का कठोर होना सिर्फ जगह छोड़ने तक सीमित नहीं है। चाहे वो मुँह से बात करना हो या कोई जगह छोड़ना, सब कुछ इतना कड़वा है कि बोले गए शब्द सहज नहीं हैं। यह उस ज़बरदस्ती की बात है, जब दिल का दर्द इतना गहरा हो कि हर बात बोलना भी एक जंग बन जाए।

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