बुलबुलें पाईज़ में कहती थीं होता काशके
यक मिज़ा रंग फ़रारी इस चमन का आश्ना
“The nightingales in Paiz used to say, 'How I wish for a different color, a fugitive from this garden's familiarity.'”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
बुलबुलें पाईज़ में कहती थीं होता काशके, याक मिज़ा रंग फ़रारी इस चमन का आश्ना। इसका शाब्दिक अर्थ है कि बुलबुलें पाईज़ में कहती थीं कि काश उन्हें एक अलग रंग मिलता, जो इस बाग की परिचितता से दूर हो।
विस्तार
यह शेर एक बहुत ही गहरा एहसास बयां करता है। शायर कहते हैं कि पतझड़ में बुलबुलें यह दुआ करती हैं कि यह 'फ़रारी' का मिज़ाज, यह भागने का रंग, इस बाग़ के लिए भी जाना-पहचाना हो। यह इंसान की उस ख्वाहिश को बयां करता है कि ज़िंदगी में एक ऐसा सुकून हो, एक ऐसा आज़ादी का एहसास हो, जो हमेशा से हमारा अपना लगे।
