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सब्र भी करिए बला पर 'मीर'-साहिब जी कभू
जब न तब रोना ही कुढ़ना ये भी कोई ढंग है

Wait patiently for the misfortune, O Mir Sahib, for it is not the way to cry or mourn when it has not yet come.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

आप विपत्ति पर धैर्य रखें, ऐ मीर साहिब, क्योंकि जब वह नहीं आई है, तब रोना या शोक मनाना कोई ढंग नहीं है।

विस्तार

ये शेर सिर्फ़ सब्र की बात नहीं करता, ये ज़िंदगी की समझदारी की बात करता है। शायर जी कहते हैं कि विपत्ति के समय हमें धैर्य रखना चाहिए, लेकिन साथ ही ये भी कहते हैं कि जब रोने का कोई वज़ह नहीं है, तब रोना भी एक आदत है, एक अजीब सा ढंग है। यह हमें सिखाता है कि भावनाएं कब और क्यों व्यक्त करनी हैं, इसकी समझ होना बहुत ज़रूरी है। यह सिर्फ़ ग़म नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं पर काबू पाना है।

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